औरत…. by Alok Meher

रौनक-ए-बज़्म, जीनत-ए-खुदाई,
नूर-ए-चश्म, हुस्न इन्तहाई ||

शब-ए-शायर, जाम-ए-शिरीं, 
तख़ल्लुस-ए-औरत, नजीर-ए-जबीं ||

क़ाबिल-ए-गौर , जंग-ए-शोर,
मल्लिका-ए-मोबाइल, आतंक पुरज़ोर ||

नूर-ए-क़ाबा, शान-ए-मक्का,
नज़ाकत-ए-लखनऊ, दाना-ए-मुनक्का ||

क़रार-ए-जिगर, फ़ितरत-ए-फ़िक़र,
आब-ए-ज़मज़म, शोला-ए-नज़र ||

शमा-ए-महफ़िल, क़ज़ा-ए-आशिक़,
तरन्नुम-ए-शेर, खुश्बू-ए-इत्र ||

Alok Meher Srivastava

I am a software engineer by profession and love to write poems and abstract poetries. I am writing for past 17 years and would love to write forever.

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