मुक्तक

नोटबंदी/ अमरेश गौतम

गड्डी महलों की या न निकली,
अपने बटुए से नोट पुराने चले गए।
सुबह शाम हम खड़े कतारों में हर दिन,
बैंकों से महलों में पैसे चले गए।

# नोटबंदी- एक सिलसिला#

अमरेश गौतम

कवि /पात्रोपाधि अभियन्ता

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