अजब दुनिया है नाशायर यहाँ पर सर उठाते हैं – मुनव्वर राना

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अजब दुनिया है नाशायर यहाँ पर सर उठाते हैं
जो शायर हैं वो महफ़िल में दरी-चादर उठाते हैं

तुम्हारे शहर में मय्यत को सब काँधा नहीं देते
हमारे गाँव में छप्पर भी सब मिल कर उठाते हैं

इन्हें फ़िरक़ापरस्ती मत सिखा देना कि ये बच्चे
ज़मीं से चूमकर तितली के टूटे पर उठाते हैं

समुन्दर के सफ़र से वापसी का क्या भरोसा है
तो ऐ साहिल, ख़ुदा हाफ़िज़ कि हम लंगर उठाते हैं

ग़ज़ल हम तेरे आशिक़ हैं मगर इस पेट की ख़ातिर
क़लम किस पर उठाना था क़लम किसपर उठाते हैं

बुरे चेहरों की जानिब देखने की हद भी होती है
सँभलना आईनाख़ानो, कि हम पत्थर उठाते हैं

– मुनव्वर राना

Ajab duniya hai Na-Shayar yaha’n par sar uthaate hain
Jo shayar hai wo mehfil me dari-chaadar uthaate hain

Tumhare shahr me’n mayyat ko sab kzandha nahi’n dete
Humare ghaanv me’n chappar bhi sab milkar uthaate hain

Inhe firaqaparasti mat sikha dena ki ye baache
Zamee’n se choom kar titli ke toote par utaate hain

Samandar ke safar se waapsi ka kya bharosa hai
To aye saahil khuda haafiz ki Hum Langar uthaate hain

Ghazal Hum Tere Aashiq hain Magar iss pet ki khaatir
Qalam kis par uthaana tha Qalam kis par uthaate hain

Bure chehre ki jaanib dhekhne ki had bhi hoti hai
Sambhalna aainakhano’n ki hum patthar uthaate hain

-Munawwar Rana

~aakaasshhh~

शायरी करनी है तो मुहब्बत कर... दिल के जख्म जरूरी है शायरी के लिए...

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