अस्मत क्या बिकाऊ थी उसकी,
जो तूने लूट ली?
करके एक अबला की इज्ज़त को तार-तार,
अपने पुरुषार्थ की चादर ओढ़ ली||

किसी के चमन की कली, 
आज मसल दी गयी,
तेरी दरिंदगी की इन्तेहां है ये, कि
आज वो तस्वीर बन गयी||

वो तेरी बहन भी हो सकती है,
सुन ऐ नामर्द,
तस्वीर बन लटक सकती है दीवार पर,
करके तेरे चेहरे को ज़र्द||

तूने जो किया है,
उससे ज्यादा तुझे मिले,
तू भी तड़पे उसकी याद में,
तिल-तिल कर मरे||

तेरे पैदा होने से,
शर्मसार है सारी इंसानियत,
तेरी माँ की कोख शर्मसार है,
कि झेली उसने इतनी जहालत||

Alok Meher Srivastava

I am a software engineer by profession and love to write poems and abstract poetries. I am writing for past 17 years and would love to write forever.

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