Categories: ग़ज़लें

बेटी की विदाई /अमरेश गौतम’अयुज’

सुप्रभात

नये रिस्तों से बंधन, कुछ बेगाने हो गये,
अनजाने अपने हुए, अपने अनजाने हो गये। 

जिस आंगन को महसूस किया, अपनापन के भाव से,
नया किस्सा क्या मिला, सब फसाने हो गये।

एहतमाम जिन चीजों का किया, शिद्दत से अब तलक,
मेरे लिए वो ही सब, नजराने हो गये।

चेहरा देखूं मां का या भाई की देखूं शकल,
मेरे लिए आज सब क्यों मनमाने हो गये।

बाबूल कैसी ये रीत, बनाई तुमने ‘अयुज’
कि सारे अपने ही पराये, क्यूँ न जाने हो गये।

अमरेश गौतम

कवि /पात्रोपाधि अभियन्ता

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