Ek Maa Ki Vyatha… Hindi Kavita

गए ज़माना हुआ तुझे,
ऐ मेरे लख्त-ए-जिगर,
आ भी जा अब लौट कर, 
तेरे दीदार को तरसे नज़र ||

तेरे पिता तो कुछ कहते नहीं,
बस घुटते रहते हैं,
तेरी आवाज़ सुनने के लिए,
रोज़ मोबाइल निहारा करते हैं ||

जब घंटी बजती है फ़ोन की,
चौकन्ने हो जाते हैं,
मायूस हो कर बैठ जाते हैं,
जब तेरा चेहरा नहीं देख पाते हैं ||

कल तेरा पसंदीदा गाना,
आ रहा था टीवी पर,
पलक न झपकाई उन्होंने,
देखते रहे बेख़बर ||

आज, दिन बड़ा भारी है बेटा,
पता नहीं कब शाम हो,
शाम से पहले ही लौट आ,
ना जाने फिर कब मुलाक़ात हो ||

 

Alok Meher Srivastava

I am a software engineer by profession and love to write poems and abstract poetries. I am writing for past 17 years and would love to write forever.

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