कहीं न कहीं तुम
मेरे शब्दों में झांक रहे
कैसे कहूँ याद नहीं आते हो 
तुम्हारी झिलमिल
सी हंसी
कानों में गूँज रही हो जैसे
हौले से पूछ गयी
कैसे रहोगे बिना हमारे
कहीं न कहीं तुम मात्राओं
में उलझ रहे हो
कैसे कहूँ याद नहीं आते हो
भीगे मन के आँगन पर
तेरे रंग में रची अल्पना
और अपना सम्बन्ध सहेजे
चुप चुप सी सयुंक्त कल्पना
कहीं न कहीं तुम
बिंदिया में उलझ रहे
कैसे कहूँ याद नहीं आते हो
सम्बोधन में भटका ये मन
सिमट रहा भीगा सा ये तन
रात और दिन की इस उलझन में
प्यासा का प्यासा ये सावन
कहीं न कहीं तुम
मेरे गीतों में झलक रहे
कैसे कहूँ याद नहीं आते हो
आभा..

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