कोलाहल मन के भीतर…

कोलाहल मन के भीतर, अंतर्मन व्याकुल,
भयाक्रांत सब दिशायें, हलचल प्रतिपल|

स्वर्णिम दिवस हरित रात्रि,कहाँ ग़ुम हुई?, 
अश्वेत दिवस, अमावास रात्रि,क्यूँ कर हुई?

चीर सा लम्बा जीवन, कैसे कटेगा?
अपनों से किया वादा, कैसे निभेगा?

जवाब वहीँ छिपा है, किसी कोने में,आवश्यकता है,
परत उठाने की, नैराश्य के बादल को, एक और करने की |

जीवन लम्बा है, व्यर्थ मत गवां,
देख, वो स्वर्णिम भोर तेरी राह देख रहा है|

Alok Meher Srivastava

I am a software engineer by profession and love to write poems and abstract poetries. I am writing for past 17 years and would love to write forever.

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