Kuch Is Tarah Se Badnaam

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कुछ इस तरह से बदनाम, मै ज़माने में रहा,
कि नाकाम हर इक रिश्ता, निभाने में रहा,

ये कैसे बताये उनको, कि मगरूर नही हम, 
जिक्र बस उनका ही, मेरे हर फ़साने में रहा,

मुझे बर्बाद करता, मेरे रक़ीब की मज़ाल नही,
कोई अपना शामिल, मेरा आशियाँ जलाने में रहा,

मुमकिन नही उन्हें सजा मिल जाये गुनाहों की,
यंहा कातिल को, खुद मकतूल बचाने में रहा,

बफा के नाम पे, जब से बेघर हुआ है “मन,”
तमाम उम्र भर पता उसका, मैखाने में रहा,
~~~~~~~~
मनोज सिंह “मन

Manoj Singh

दिल मांग तो रही हो, संभाल पाओगी तुम, बस इतना ख़याल रहे , ये टूटता बहुत है, अपनों की बेरुखी से. - मनोज सिंह 'मन'

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