Categories: ग़ज़लें

क्यों तेरा शहर मेरा शहर नहीं है

उस जगह की पहले सी क्यों, शामो-सहर नहीं है,
क्यों तेरा शहर मेरा शहर नहीं है।

जब भी आया यहां मेहमान की तरह,
सोचता हूँ तेरे शहर में क्यों घर नहीं है।

मय से लबालब मयकदा तेरा साकी,
मुझको क्यूँ इक बूँद भी मयस्सर नहीं है।

दिल में यादों की रोशनी उतनी ही तेज है,
ये शहर तो पतंगा है जिसको खबर नहीं है।

तेरी यादों का मौसम है कि बेवक्त आता है,
मैं आ गया हूँ पर तेरी खबर नहीं है।

अमरेश गौतम

कवि /पात्रोपाधि अभियन्ता

Leave a Comment

Recent Posts

जो खानदानी रईस हैं वो मिजाज रखते हैं नर्म अपना / शबीना अदीब

ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई-नई है,अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में,… Read More

2 months ago

वक़्त शायरी | समय शायरी | Waqt Shayari in Hindi – Part 2

वक़्त शायरी | समय शायरी | Waqt Shayari in Hindi - Part 2 (26 से… Read More

5 months ago

दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई …

दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई जैसे एहसान उतारता है कोई आईना देखकर तसल्ली हुई… Read More

5 months ago

तीरगी चांद के ज़ीने से सहर तक पहुँची – राहत इन्दोरी

तीरगी चांद के ज़ीने से सहर तक पहुँची ज़ुल्फ़ कन्धे से जो सरकी तो कमर… Read More

5 months ago

वक़्त शायरी | समय शायरी | Waqt Shayari in Hindi – Part 1

वक़्त शायरी | समय शायरी | Waqt Shayari in Hindi - Part 1 (1 से… Read More

5 months ago

नोटबंदी/अमरेश गौतम

जमा पूरी रकम को, कालाधन न कहो साहब, गरीबों के एक-एक रुपये का,उसी में हिसाब… Read More

5 years ago