प्यास का मतलब ये पानी ही समझते हैं
बात  दुनियाँ  वाले पुरानी ही समझते हैं

रोज़  मरते हैं जीने की ख्वाहिश में लोग 
यहाँ मौत को भी ज़िंदगानी ही समझते हैं

बात हक़ की थी तो वो तलवार हो गये
लोग  फ़र्ज़  को परेशानी  ही समझते हैं

कशिश नहीं कोई कसक़ नहीं जिसमे ऐसी
ज़िंदगी  को  हम  बेमानी ही समझते हैं

नज़र  ना  पहचानें या अंजान हैं इनसे
दिल की बातें भी ज़बानी ही समझते हैं

चाँद  को   देखा है   उन्होनें  क़रीब से
आज भी  इसे हम  कहानी ही समझते हैं

क्या हुआ गर बसा लिया घर परदेस में’सरु’
अपने दिल को हिन्दुस्तानी ही समझते हैं

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