Categories: ग़ज़लें

साये उतरे पंछी लौटे बादल भी छुपने वाला… Bashir Badr

Published by

साये उतरे, पंछी लौटे , बादल भी छुपने वाला है
लेकिन मैं वो टूटा तारा, जो घर से जाने वाला है

फिर सुबह हुई आँखें खोलें , कपड़ें बदले , फीते बांधे
उस शहर के बारे में सोचे , जो शहर अब आने वाला है

कल शब एक वीरा मसजिद में उसने मेरे आँसू पोंछे
जो सबकी सूखी शाखों पर फूल खिलाने वाला है

दिल के ये दोनों दरवाजे कभी नहीं बे-नूर हुए
सदियों से इस उजड़े घर में , एक दीया जलाने वाला है

मैं वो शबनम , जो फूलों की आँखों में रहे और ये सोचे
ऐसा लगता है , जैसे अब सब हाथ से जाने वाला है

हम रेत के जलते जर्रे को ये धूप ही चमकाए वरना
दर्या कतराने वाला है, बादल तरसाने वाला है

जुगनू चमके, तो मैं चौकू , तारा निकले , तो मैं सह्मू
जैसे हर कोई मेरे ही घर आग लगाने वाला है

जिस छप्पर के नीचे गावों के बूढ़े हुक्का पीते हैं
उस छत पे एक पागल लड़का अब आग लगाने वाला है

जिस आईने को पर्स में तुम रखे फिरते थे, टूट गया
ये धूप की शीशा आँखों पर नेज़े चमकाने वाला है

-बशीर बद्र

~aakaasshhh~

शायरी करनी है तो मुहब्बत कर... दिल के जख्म जरूरी है शायरी के लिए...

Leave a Comment

Recent Posts

दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई …

दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई जैसे एहसान उतारता है कोई आईना देखकर तसल्ली हुई… Read More

2 months ago

तीरगी चांद के ज़ीने से सहर तक पहुँची – राहत इन्दोरी

तीरगी चांद के ज़ीने से सहर तक पहुँची ज़ुल्फ़ कन्धे से जो सरकी तो कमर… Read More

2 months ago

नोटबंदी/अमरेश गौतम

जमा पूरी रकम को, कालाधन न कहो साहब, गरीबों के एक-एक रुपये का,उसी में हिसाब… Read More

5 years ago

नोटबंदी/ अमरेश गौतम

गड्डी महलों की या न निकली, अपने बटुए से नोट पुराने चले गए। सुबह शाम… Read More

5 years ago