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सावन का गीत

बागों में विविध पुष्प और मनभावन उनकी लाली,
भर गया सलिल चहुँ ओर दिखती हर दिश ही हरियाली।
पतझड़ में उजड़े पत्ते आए,भर गई पात से डाली, 
झर-झर करता नीर धाम से,कल-कल करती नाली।
सावन आया वनमाली।

कहीं पपीहा राग अलापे,कहूँ कोकिल स्वर वाली,
नाँच उठे वनमोर कहीं पर,कहीं घहर घन वाली।
कुन्ज-कुन्ज हिलोरें लेतीं,बही पवन मतवाली,
उपवन की रंग-बिरंगी कलियाँ, खुलीं सुवासों वाली।
सावन आया वनमाली।

अमरेश गौतम

कवि /पात्रोपाधि अभियन्ता

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