Categories: ग़ज़लें

मुफलिसी में भी यहाँ/अमरेश गौतम’अयुज’

मुफलिसी में भी यहाँ, सुकून से हर बशर रहता है,
उन रेशमी परदों की दीवारों से,डर लगता है।

कितनी आजादी है,इन बस्तियों में रहने वालों को,
अमीरों की नगरी में कैदखाने सा,हर घर लगता है।

कितनी मासूमियत है,इनके चेहरे पर देखिए,
महलों वालों का दंभ से,अकड़ा सर लगता है।

वो नहीं समझते इन्हें, बराबरी के काबिल,
‘अयुज’ उनके शानो-शौकत में, इनका असर दिखता है।

अमरेश गौतम

कवि /पात्रोपाधि अभियन्ता

Leave a Comment

Recent Posts

दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई …

दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई जैसे एहसान उतारता है कोई आईना देखकर तसल्ली हुई… Read More

2 months ago

तीरगी चांद के ज़ीने से सहर तक पहुँची – राहत इन्दोरी

तीरगी चांद के ज़ीने से सहर तक पहुँची ज़ुल्फ़ कन्धे से जो सरकी तो कमर… Read More

2 months ago

नोटबंदी/अमरेश गौतम

जमा पूरी रकम को, कालाधन न कहो साहब, गरीबों के एक-एक रुपये का,उसी में हिसाब… Read More

5 years ago

नोटबंदी/ अमरेश गौतम

गड्डी महलों की या न निकली, अपने बटुए से नोट पुराने चले गए। सुबह शाम… Read More

5 years ago