Categories: ग़ज़लें

ये भी शरारत थी, नफरत न थी…

फेर ली ग़र निगाहें, हया से किसी ने,
फ़कत इक नजाकत थी,नफरत न थी।

फिर तकल्लुफ किया,बदली राहें सभी, 
ये भी शरारत थी,नफरत न थी।

काफिर नज़रों से बे-मौत मारा मुझे,
हथियार-ए-जंग की उनको,जरूरत न थी।

ये थे नखरे मोहब्बत के, आगोश के,
उनको ऐसा न था,कि चाहत न थी।

मिलके उनसे कभी,माँगा था कन्द-ए-लब,
इतनी सी इल्तिजा थी,कोई हरकत न थी।

फूलों सा वो ज़बीं, इतना दिलकश अयुज’,
देखकर उनको कोई भी,हसरत न थी।

साख-ए-गुल सी हुई, इब्तिदा-ए-मोहब्बत,
दुश्मनों से शक्ति,हिफाजत न थी।

कारवाँ लुट गया,मंजिले लुट गयीं,
‘अयुज’ फिर भी उनको,हैरत न थी।

अमरेश गौतम

कवि /पात्रोपाधि अभियन्ता

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